आरक्षण शब्द जो भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय भी रहा है और चुनावी मुद्दा भी ! आरक्षण के मसले पर संसद भवन एवं राज्यों की विधानसभाओं में होने वाला सिरफुटोंव्वल किसी से छुपा नही है ! आरक्षण का शिगूफा उठा नही की हर नेता अपने-अपने स्तर पर इसे भुनाने की कोशिश में लग जाता है ! आरक्षण नीति पर देश के नेताओं द्वारा हंगामा तो ऐ दिन देखने को मिलता है ! अपने भाषणों के माध्यम से आरक्षण का प्रलोभन देने में तो कोई नेता पीछे बैठने को तैयार नही है ! यह एक ऐसा मुद्दा है जो क्षेत्रीय स्तरों पर नेताओं द्वारा खूब इस्तेमाल होता रहा है ! आये दिन कहीं गुर्जर आरक्षण तो कहीं मीणा आरक्षण , कहीं दलित आरक्षण तो कहीं मराठी आरक्षण या फिर महिला आरक्षण का मुद्दा हो , अलग-अलग नेताओं द्वारा उठाया जाता रहा है ! इस आरक्षण के मुद्दे ने तो कई बार सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने एवं नाजुक स्थितियाँ उत्पन्न करने का काम किया है ! आरक्षण केवल राजनीति का ही नही वरन भारतीय संविधान का भी एक शब्द है , और इसे संवैधानिक मान्यता भी प्राप्त है ! लेकिन आज के दौर में आरक्षण प्रदान करने के लिए जिन मानकों को आधारभूत बनाया जा रहा है , कहीं न कहीं वो राष्ट्र की आतंरिक शक्ति को क्षीण कर रहे हैं ! आरक्षण का सीधा अर्थ है की समाज में रहने वाले उन लोगों को विकास के विशेष अवसर प्रदान करना जो आर्थिक ,शैक्षिक,समाजिक एवं मानसिक रूप से पूर्ण विकसित न हो या पिछड़ेपन का शिकार हों ! इस बात का जिक्र करना जरुरी है कि यहाँ मै आरक्षण के लिए 'समाज एवं समाज के लोगों ' शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यह समाज किसी एक समुदाय का नही , किसी जाति विशेष का नही या किसी वर्ग विशेष का भी नही है ! समाज को परिभाषित करने के लिए मानव या व्यक्ति शब्द ही काफी है ! लेकिन यह दुर्भाग्य है कि समाज में रहने वाले पिछड़े एवं गरीब तबके के लोगों के विकास हेतु , आरक्षण एवं अन्य सुविधाएँ प्रदान करने के जो मानक बनाए जा रहे हैं या जो मानक नेताओं द्वारा प्रस्तावित किये जा रहे हैं वो समाज के विकास कि बजाय समाज को विभाजित करने एवं ओछी राजनीति को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं ! सवाल ये उठता है इस एक अरब दस करोड़ जनसँख्या वाले देश में सरकार किसे गरीब या पिछड़ा मान रही है ? या वो कौन से निम्नतम मानक हैं जिनके आधार पर किसी को पिछड़े तबके का माना जाय ? भारतीय राजनेताओं ने आरक्षण के जो मानक निर्धारित किये हैं वो काफी हास्यप्रद प्रतीत होते हैं ! आज भारत में पिछड़े समाज को आरक्षण देने का जो मानक निर्धारित किया गया है वो व्यक्ति कि जाति है ! व्यक्ति कि जाति के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है कि उक्त व्यक्ति आरक्षण के योग्य है या नही ! भारतीय नेताओं द्वारा वर्त्तमान परिवेश में 'पिछड़ा' शब्द को जिस ढंग से परिभषित किया जा रहा है , वो सार्थकता से परे है ! यह बात गले नही उतरती हर हालत में कोई सवर्ण परिवार पिछड़ेपन का शिकार नही हो सकता है ! ये मान लेना कि कोई ब्राम्हण या राजपूत परिवार पिछड़ा नही हो सकता , पूर्णतया निराधार है! मेरे मत में समाज के विकास हेतु आरक्षण नीति का होना नितांत आवश्यक है ! परन्तु आरक्षण प्रदान करने हेतु मानकों के निर्धारण को सियासी रंग से दूर रखने कि जरुरत है ! क्योंकि ये देश के विकास का प्रश्न है ,कोई राजनीतिक मुद्दा नही ! अगर हम जाति एवं संप्रदाय को आरक्षण का आधारभूत मानक बनाते हैं तो समाज में दो विकट समस्याएँ उत्पन्न होने का खतरा रहता है ! पहली यह कि आरक्षण कि सुविधाएँ सार्वभौमिक पिछड़े समाज के लिए न होकर एक सीमित दायरे तक सिमट कर रह जायेगी और न जाने कितने पिछड़े लोग जो उस जाति विशेष के दायरे में नही आते हैं , आरक्षण कि सुविधाओं से वंचित रह जाएँगे ! दूसरी समस्या जो उत्पन्न होगी वो तो संविधान के लिए ही एक प्रश्नचिन्ह लगाने वाली है , कि वही संविधान जो जाति-पाति से ज्यादा समाजिक समानता पर बल देता है , में निहित आरक्षण शब्द के प्रयोग के लिए जाति को मानक बनाना यथोचित होगा ? ऐसा करने पर क्या जाति-पाति कि भावना को बल नही मिलेगा ? आरक्षण मानकों में हो रहे दोहरेपन से क्या समाज में जाति-पाति ,समाजिक असमानता , ऊँच-नींच कि भावना बलवती नही होगी ? एक तरफ अगर ये कहा जाय कि समाज में सभी समान हैं तो दूसरी तरफ समाजिक सुविधाओं के बटवारें में जाति को ही आधार बनाना क्या समाजिक विषमता को नही जन्म देगा ? अतः एक बात तो साफ है कि आरक्षण नीति पर राजनीति कि नही वरन चर्चा एवं विचार कि जरुरत है , जिससे कि उन मानकों का निर्धारण किया जा सके जो आरक्षण कि सुविधाओं को देश के हर जाति हर धर्म के पिछड़े परिवारों तक पहुंचा सके ! आरक्षण पर राजनीति करने से समाजिक विषमता का खतरा बना रहेगा ! आरक्षण पर होने वाली गन्दी राजनीति किसी साम्प्रदायिकता कि राजनीति से कम नही है जो समाज में जातिवाद को बढ़ावा देने का काम कर रही हो ! जाति के लीक से हट कर कुछ ऐसे तथ्यों पर विचार करने कि जरूरत है , जिससे समाजिक पिछड़ेपन हेतु लागु होने वाले आरक्षण के लिए एक सार्वभौमिक मानक निर्धारित हो सके ! क्योंकि पिछड़ा सवर्ण हो या दलित ,विकास के अवसर तो दोनों को मिलने चाहिए ! 'पिछड़ापन' और ' आरक्षण ' के मध्य ' जाति ' शब्द का कोई स्थान नही है ! शिवानन्द द्विवेदी "सहर"