गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

दो पल की ज़िंदगी के लिए.......

मै मर भी सकता हूँ मै मिट भी सकता हूँ !
मगर डरता हूँ सिर्फ दो पल की ज़िंदगी के लिए !


मुझे मारने का ख्याल लाना ना एक पल भी ,

मै तो ज़िंदा हूँ सिर्फ दो पल की ज़िंदगी के लिए !

घुटन भरी हवाएं फिजाओं में चल रहीं फिर भी ,

सांस ले रहा हूँ सिर्फ दो पल की ज़िंदगी के लिए !

तमाम उम्र का ये बोझ दुश्मनों को मुबारक हो ,

मुझे तो छोड़ दो सिर्फ दो पल की ज़िंदगी के लिए !

ज़िंदगी भी मातम
मनाती है उनके मौतों पर,
जो जी रहे थे अबतक दो पल की ज़िंदगी के लिए !

कभी तुम मत आजमाना मेरी ज़िंदगी से मुहब्बत को!

एक पल में ही मिट जाउंगा इस दो पल की ज़िंदगी के लिए !

या खुदा या मालिक अब तो रहम कर दे ,

एक पल ही दे दे ना इस दो पल की ज़िंदगी के लिए ! 

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

कहाँ तू कहाँ .........?

निगाहें थमी की थमी रह गयीं
जब निगाहों में जल का समंदर बना
जिस दिल को  तसल्ली दिलाते थे 
वो
वो दिल ही जिसम का सितमगर बना 

अश्रुओं की श्रद्धा बस है अर्पित तुम्हे
अब तेरा हर सफ़र बस मुक्कद्दर बना
जिस मुक्कद्दर ने मुझसे था धोखा किया
उस मुक्कद्दर का ही मै सिकंदर बना

निगाहें जखम देखती ही रहीं

हर जगह जख्म के दाग देखे जहां
पर निगाहें अभी खोजती हैं उन्हें
पूछती हर मुसाफिर से हैं वो कहाँ

ह्रदय में ये यादों का जज्बा उठा

कुछ ह्रदय के तरंगों का नजमा उठा
जिन्दगी का वो बढ़ता कदम रुक गया
रोते-रोते हमारा गला सुख गया

जीवन का हर पल अब तन्हा हुआ

हर बरस की तरह हर एक लम्हा हुआ
जो उन्हें ले गया वो कहर है कहाँ
मौत के मंजिलों का ज़हर है कहाँ

मै श्रद्धा सुमन आज अर्पण करूँ

तुच्छ
  हाथों से तुझको क्या तर्पण करूँ
अश्रुं बूँदें मेरी अब गिरेंगी जहां
हर जगह पूछेंगी कह कहाँ तू कहाँ .............कह कहाँ तू कहाँ ...........कह 


किसी अज़ीज़ की पुण्यतिथि पर रचित पंक्तिया जो आज तक कभी भी कहीं भी साझा नहीं की और उसकी हर पुण्यतिथि पर दोहराता हूँ आज प्रथम बार सबके सामने रख रहा हूँ........

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

कविता : अब हैरान हूँ मैं ….

जीवन की इस भीड़ भरी महफ़िल में,
एक ठहरा हुआ सा वीरान हूँ मै,
क्यों आते हो मेरे यादों के मायूस खंडहरों में ,
अब चले जाओ बड़ा परेशान हूँ मै …

तुमसे मिलकर ही सजोयी थी चंद खुशियाँ मैंने,
पर तुम्हें समझ ना पाया ऐसा अनजान हूँ मैं,
बड़ा मासूम बनकर उस दिन जो बदजुबानी की थी,
तो आज गैर क्यों ना कहें कि बड़ा बदजुबान हूँ मै,

तुने अच्छा किया जो मुझे जिल्लतें बेरुखियाँ दी,
मुझे तो खुशी है की तेरी जिल्लत भरी जुबां हूँ मै,
जिस शाम के बाद किसी सहर की उम्मीद ही ना हो,
वैसा ही मनहूस ढलता हुआ एक शाम हूँ मैं,

मुर्दों के जले भी जहां अब जमाने हो गए,
ऐसा ही सुनसान एक श्मशान हूँ मैं,
मै तुमको भूल गया इसमे तो मेरी ही साजिश थी,
पर तू जो भूल गया मुझको तो अब हैरान हूँ मैं…….