गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

दैनिक जागरण राष्ट्रीय संसकरण में एफ.डी.आई पर प्रकाशित मेरा आलेख "एफ.डी.आइ का दिखावटी विरोध"


शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

आरक्षण के मानक समाजिक हो,सियासी नहीं

 रक्षण शब्द जो भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय भी रहा है और चुनावी मुद्दा भी ! आरक्षण के मसले पर संसद भवन एवं राज्यों की विधानसभाओं में होने वाला सिरफुटोंव्वल किसी से छुपा नही है ! आरक्षण का शिगूफा उठा नही की हर नेता अपने-अपने स्तर पर इसे भुनाने की कोशिश में लग जाता है ! आरक्षण नीति पर देश के नेताओं द्वारा हंगामा तो ऐ दिन देखने को मिलता है ! अपने भाषणों के माध्यम से आरक्षण का प्रलोभन देने में तो कोई नेता पीछे बैठने को तैयार नही है ! यह एक ऐसा मुद्दा है जो क्षेत्रीय स्तरों पर नेताओं द्वारा खूब इस्तेमाल होता रहा है ! आये दिन कहीं गुर्जर आरक्षण तो कहीं मीणा आरक्षण , कहीं दलित आरक्षण तो कहीं मराठी आरक्षण या फिर महिला आरक्षण का मुद्दा हो , अलग-अलग नेताओं द्वारा उठाया जाता रहा है ! इस आरक्षण के मुद्दे ने तो कई बार सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने एवं नाजुक स्थितियाँ उत्पन्न करने का काम किया है ! आरक्षण केवल राजनीति का ही नही वरन भारतीय संविधान का भी एक शब्द है , और इसे संवैधानिक मान्यता भी प्राप्त है ! लेकिन आज के दौर में आरक्षण प्रदान करने के लिए जिन मानकों को आधारभूत बनाया जा रहा है , कहीं न कहीं वो राष्ट्र की आतंरिक शक्ति को क्षीण कर रहे हैं ! आरक्षण का सीधा अर्थ है की समाज में रहने वाले उन लोगों को विकास के विशेष अवसर प्रदान करना जो आर्थिक ,शैक्षिक,समाजिक एवं मानसिक रूप से पूर्ण विकसित न हो या पिछड़ेपन का शिकार हों ! इस बात का जिक्र करना जरुरी है कि यहाँ मै आरक्षण के लिए 'समाज एवं समाज के लोगों ' शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यह समाज किसी एक समुदाय का नही , किसी जाति विशेष का नही या किसी वर्ग विशेष का भी नही है ! समाज को परिभाषित करने के लिए मानव या व्यक्ति शब्द ही काफी है ! लेकिन यह दुर्भाग्य है कि समाज में रहने वाले पिछड़े एवं गरीब तबके के लोगों के विकास हेतु , आरक्षण एवं अन्य सुविधाएँ प्रदान करने के जो मानक बनाए जा रहे हैं या जो मानक नेताओं द्वारा प्रस्तावित किये जा रहे हैं वो समाज के विकास कि बजाय समाज को विभाजित करने एवं ओछी राजनीति को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं ! सवाल ये उठता है इस एक अरब दस करोड़ जनसँख्या वाले देश में सरकार किसे गरीब या पिछड़ा मान रही है ? या वो कौन से निम्नतम मानक हैं जिनके आधार पर किसी को पिछड़े तबके का माना जाय ? भारतीय राजनेताओं ने आरक्षण के जो मानक निर्धारित किये हैं वो काफी हास्यप्रद प्रतीत होते हैं ! आज भारत में पिछड़े समाज को आरक्षण देने का जो मानक निर्धारित किया गया है वो व्यक्ति कि जाति है ! व्यक्ति कि जाति के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है कि उक्त व्यक्ति आरक्षण के योग्य है या नही ! भारतीय नेताओं द्वारा वर्त्तमान परिवेश में 'पिछड़ा' शब्द को जिस ढंग से परिभषित किया जा रहा है , वो सार्थकता से परे है ! यह बात गले नही उतरती हर हालत में कोई सवर्ण परिवार पिछड़ेपन का शिकार नही हो सकता है ! ये मान लेना कि कोई ब्राम्हण या राजपूत परिवार पिछड़ा नही हो सकता , पूर्णतया निराधार है! मेरे मत में समाज के विकास हेतु आरक्षण नीति का होना नितांत आवश्यक है ! परन्तु आरक्षण प्रदान करने हेतु मानकों के निर्धारण को सियासी रंग से दूर रखने कि जरुरत है ! क्योंकि ये देश के विकास का प्रश्न है ,कोई राजनीतिक मुद्दा नही ! अगर हम जाति एवं संप्रदाय को आरक्षण का आधारभूत मानक बनाते हैं तो समाज में दो विकट समस्याएँ उत्पन्न होने का खतरा रहता है ! पहली यह कि आरक्षण कि सुविधाएँ सार्वभौमिक पिछड़े समाज के लिए न होकर एक सीमित दायरे तक सिमट कर रह जायेगी और न जाने कितने पिछड़े लोग जो उस जाति विशेष के दायरे में नही आते हैं , आरक्षण कि सुविधाओं से वंचित रह जाएँगे ! दूसरी समस्या जो उत्पन्न होगी वो तो संविधान के लिए ही एक प्रश्नचिन्ह लगाने वाली है , कि वही संविधान जो जाति-पाति से ज्यादा समाजिक समानता पर बल देता है , में निहित आरक्षण शब्द के प्रयोग के लिए जाति को मानक बनाना यथोचित होगा ? ऐसा करने पर क्या जाति-पाति कि भावना को बल नही मिलेगा ? आरक्षण मानकों में हो रहे दोहरेपन से क्या समाज में जाति-पाति ,समाजिक असमानता , ऊँच-नींच कि भावना बलवती नही होगी ? एक तरफ अगर ये कहा जाय कि समाज में सभी समान हैं तो दूसरी तरफ समाजिक सुविधाओं के बटवारें में जाति को ही आधार बनाना क्या समाजिक विषमता को नही जन्म देगा ? अतः एक बात तो साफ है कि आरक्षण नीति पर राजनीति कि नही वरन चर्चा एवं विचार कि जरुरत है , जिससे कि उन मानकों का निर्धारण किया जा सके जो आरक्षण कि सुविधाओं को देश के हर जाति हर धर्म के पिछड़े परिवारों तक पहुंचा सके ! आरक्षण पर राजनीति करने से समाजिक विषमता का खतरा बना रहेगा ! आरक्षण पर होने वाली गन्दी राजनीति किसी साम्प्रदायिकता कि राजनीति से कम नही है जो समाज में जातिवाद को बढ़ावा देने का काम कर रही हो ! जाति के लीक से हट कर कुछ ऐसे तथ्यों पर विचार करने कि जरूरत है , जिससे समाजिक पिछड़ेपन हेतु लागु होने वाले आरक्षण के लिए एक सार्वभौमिक मानक निर्धारित हो सके ! क्योंकि पिछड़ा सवर्ण हो या दलित ,विकास के अवसर तो दोनों को मिलने चाहिए ! 'पिछड़ापन' और ' आरक्षण ' के मध्य ' जाति ' शब्द का कोई स्थान नही है ! शिवानन्द द्विवेदी "सहर"

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

कौन कहता है कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है मीडिया ?



                    जब भी बात लोकतंत्र के निहित स्तंभों की होती है तो "मीडिया" का नाम अवश्य आता है ! ऐसा पढ़ता एवं सुनता आया हूँ की मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में अपना दायित्व निर्वहन कर रहा है ! यानी " इट इज वन ऑफ़ द फोर पिलर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी " ! सैद्धांतिक  रूप से ऐसा कहा एवं माना जाता है कि लोकतंत्र के चार स्तम्भ होते हैं जो इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था रूपी छत को सुद्रढ़ , स्वस्थ एवं परिशुद्ध बनाते हैं ! परन्तु जब भी इस विषय पर मै किसी विद्वान् अथवा राजनीती विश्लेषक के कथन से अलग हट कर सोचता हूँ हमेशा यही भ्रम-स्थिति बनी रहती है कि क्या वाकई "मीडिया" शब्द अथवा इसका अर्थ लोकतंत्र के स्तम्भ होने के मानकों पर खरा उतरता है ? क्या यह तथाकथित स्तम्भ शेष तीन स्तंभों के साथ समानांतर सामंजस्य बना पाता है ? मुझे स्पष्ट याद है कि लोकतंत्र शब्द पर विशेष अध्यन का अवसर मुझे बी-ए प्रथम वर्ष में मिला और संयोगवश मेरा प्रथम अध्याय ही था "सरकार एवं व्यवस्था"! उक्त विषय पर मेरे शिक्षकगण से अकसर बहस होती रहती थी कि "क्या वाकई लोकतंत्र का कोई चौथा स्तम्भ भी है ?"
                           अपने विचार को रखने से पहले मै लोकतंत्र के तीन स्तंभों का संक्षिप्त विश्लेषण करना चाहूंगा ! सैद्धांतिक रूप से लोकतंत्र के  क्रमश: प्रथम,द्वितीय एवं तृतीय स्तम्भ व्यवस्थापिका ,कार्यपालिका एवं न्यायपालिका है ! इसके बाद तथाकथित स्थान आता है मीडिया का जो किसी भी दृष्टिकोण से ना तो इन तीन स्तंभों के तटस्थ समानांतर और ना ही लोकतंत्र कि स्थापना , संरचना ,क्रियान्वन एवं संरक्षण के लिए अनिवार्य प्रतीत होता है ! मेरे मत में "मीडिया" ठीक वैसी ही एक संस्था है जैसे कोई चिकित्सालय , पशुपालन , वन्य-संरक्षण संस्थान ,स्कुल-विद्द्यालय एवं अन्य सरकारी - गैरसरकारी संस्थान ! एक संक्षिप्त तुलनात्मक अध्यन के तौर पर अगर हम बात "व्यवस्थापिका" कि करें तो यह सर्व-विदित है कि "व्यवस्थापिका एक पूर्णतया गैर-निजी,एकल,लोक प्रतिनिधित्व कि राष्ट्रीय संस्था या सभा  है "! यहाँ व्यवस्थापिका को गैर-निजी कहने का सीधा तात्पर्य यह है कि इस सभा को ना तो किसी आम अथवा ख़ास द्वारा पंजीकृत कराया जा सकता है और ना ही व्यक्तिगत आधार पर संचालित एवं क्रियान्वित किया जा सकता है ! इसे अद्वितीय कहने का आशय यह है कि किसी एक व्यवस्थित लोकतांत्रिक संरचना में राष्ट्रनिहित संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर संभव है किसी कि निजी इच्छा  पर नहीं ! व्यवस्थापिका में प्रतिनिधित्व का अवसर मिल सकता है जो जनता के द्वारा प्रत्यक्ष(लोकसभा) अथवा परोक्ष(राज्यसभा) रूप से निर्वाचित हों और अपने निर्वाचकों के प्रति संवैधानिक रूप से उत्तरदायी हों ! संवैधानिक रूप से जनता के प्रति उत्तरदायी होना इस सभा को लोकतंत्र के प्रथम स्तम्भ होने के तटस्थ ले जाता है और साथ ही लोकतंत्र के स्तम्भ होने कि पुष्टि भी करता है !
                               द्वितीय स्तम्भ के रूप में बात होती है "कार्यपालिका" की ! लोकतंत्र के द्वितीय स्तम्भ के रूप में इसकी स्वत: पुष्टि इसलिए हो जाती है कार्यपालिका का सदस्य होने के व्यवस्थापिका का सदस्य होना अनिवार्य है अथवा लोकतांत्रिक पद्धति से निर्वाचित होना  अनिवार्य है ! लोकतांत्रिक व्यवस्था को कायम रखने के लिए लोक महत्त्व कि आवश्यकताओं को समझना एवं उनको उपलब्ध कराना , लागू कराना , व्यवस्थापिका से पास विधेयक को कानून के रूप लागू कराना ,राष्ट्र प्रबंधन जैसी चीजें कार्यपालिका के मूल कर्तव्य में निहित होती हैं एवं कार्यपालिका अपने कर्तव्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति शत-प्रतिशत उत्तरदायी होती है! " लोकतंत्र के प्रथम स्तम्भ के प्रति उत्तरदायित्व कि अनिवार्यता ही कार्यपालिका के कार्यपालिका के द्वितीय स्तम्भ होने कि पुष्टि करता है "
                                 लोकतंत्र के तृतीय स्तम्भ न्यायपालिका की बात करें तो इसकी कार्य एवं संरचना पद्धति थोड़ी सी भिन्न है ,परन्तु सैद्धांतिक रूप से यह पूर्णतया लोकतान्त्रिक ढांचे को मजबूत बनाने एवं  संवैधानिक संरक्षण  का कार्य करती है ! कार्यपालिका द्वारा लाये गए विधेयक को व्यवस्थापिका से पारित होने के पश्चात न्यायपालिका उस विधेयक कि संवैधानिकता कि जाँच करने के साथ ही आवश्यकतानुसार उस कानून कि व्याख्या भी करती है ! न्यायपालिका द्वारा किया गया यह कार्य ही "न्यायिक पुनाराविलोकन" कहलाता और यही न्यायपालिका कि सबसे बड़ी शक्ति है जो व्यवस्थापिका को भी काफी हद तक नियंत्रित कर संतुलित लोकतंत्र कि स्थापना में विशेष दायित्व का निर्वहन करती है ! अगर न्यायपालिका को लगता है कि उक्त विधेयक असंवैधानिक है तो उसे निरस्त भी कर सकती है ! संविधान के संरक्षण का दायित्व भी न्यापालिका में निहित है ! इन तथ्यों से यह साफ़ होता है कि संविधान के मूल स्वरुप के संरक्षण का विशेष दायित्व भी न्यायपालिका के कन्धों पर  है एवं न्यायपालिका संविधान के प्रति पूर्णतया उत्तरदायी है ! यह कहना गलत नहीं होगा कि शासन एवं तंत्र को संचालित एवं परिभाषित करने के लिए संवैधानिक पद्धति ही सबसे बेहतर विकल्प है और न्यायपालिका संविधान के प्रति उत्तरदायी है ! "संविधान के प्रति न्यायपालिका का यह उत्तरदायित्व ही उसे लोकतांत्रिक स्तम्भ के रूप खडा करता है !" इन तीनो स्तंभों के बीच सबसे बड़ी समानता यह है कि तीनो का निजीकरण नहीं हो सकता है और और तीनो में से कोई भी किसी व्यक्ति संप्रभु के अधीन नहीं हो सकती !
                              अब बात करें लोकतंत्र के कथित चौथे स्तंभ मीडिया की ! सर्वप्रथम प्रश्न यह उठता है कि आखिर यह कथित चौथा स्तम्भ संवैधानिक रूप से किसके प्रति उत्तरदायी है ? इसके निर्माण में जनता कौन सी लोकतान्त्रिक पद्धति का प्रयोग होता है ?क्या इसमे राष्ट्रीय एकल एवं अद्वितीय संस्था होने के कोई लक्षण हैं ? क्या यह पूर्णतया गैर-निजी तौर पर संचालित है ?क्या यह पूर्णतया गैर-व्यावसायिक है ? लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ सिर्फ सवाल पूछने का कर्तव्य रखता है या संवैधानिक रूप से इसके उत्तरदायित्व का भी कोई निर्धारण है ? क्या यह पूर्णतया व्यक्ति संप्रभु के अधीन नहीं है ? मेरे मत में उपरोक्त सभी सवालों पर गौर करें तो एक बात साफ़ तौर पर नज़र आती है कि "मीडिया" में लोक उत्तरदायित्व कि अनिवार्यता बिलकुल नहीं है ! मीडिया के निर्माण में जनता का योगदान एक पेशेवर से ज्यादा कुछ भी नहीं है जैसे - टीचर,डॉक्टर ठीक वैसे ही पत्रकार ! इसके निर्माण एवं गठन कि कोई लोकतान्त्रिक पद्धति नहीं बल्कि प्रशासनिक पद्धति है ! इसके गैर निजी होने का तो सवाल करना ही बेमानी है क्योंकि आज का हर तीसरा पूंजीपति अखबार , पत्रिका, चैनल में निवेश करने में ज्यादा उत्सुक है और इसकी परिशुद्धता का आकलन इसी से किया जा सकता है !
                               अब मै जिक्र करूंगा मीडिया के कार्यों कि जिसमे प्रथम कार्य है संचार प्रेषण ! यह एक संचार का माध्यम है जो जनता को घटित अघटित घटनाक्रमों,सरकार एवं प्रशासन के कार्यों अथवा समाज कि हर छोटी बड़ी चीजों कि जानकारी उपलब्ध कराता है ! मीडिया के पक्ष में एक साकारात्मक पहलू यह है कि अक्सर लोकचेतना को जागृत करने में मीडिया का बहुत बड़ा योगदान रहता है ! परन्तु यह ठीक वैसा ही है जैसा स्वास्थ्य कल्याण विभाग द्वारा पोलियो ड्रॉप घर घर जाकर पिलवाना ,बीमारियों से लोगों को अवगत कराना ! तमाम संस्थाएं अलग-अलग स्तर पर राष्ट्रहित में कार्य कर रही है तो क्या सबको एक स्तम्भ के तौर पर देखा जाना उचित है ? मीडिया ठीक वैसे ही काम कर रहा है जैसे स्कुल, अस्पताल एवं अन्य ! मीडिया द्वारा किये जा रहे कार्य राष्ट्रहित एवं लोकहित में अवश्य हैं परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि इसे व्यवस्थापिका , कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के साथ चौथे स्तम्भ के रूप में देखा जाय ! जहां तक मुझे ज्ञात है लोकतंत्र का इतिहास आधुनिक मीडिया के इतिहास से ज्यादा पुराना  है ! ११वी शताब्दी में जब प्रथम बार ब्रिटेन में लोकतंत्र कि स्थापना हुई थी उस दौरान मीडिया(ब्रोडकास्ट) नाम की कोई चीज़ नहीं थी !
                     उपरोक्त विश्लेषण के पश्चात मै इस निष्कर्ष पर पहुच पा रहा हूँ कि लोकतंत्र कि छत सिर्फ टीन स्तंभों पर टिकी है ! इस क्रम में मीडिया कि स्थिति एक विभाग विशेष से ज्यादा नहीं परिलक्षित होती है और राष्ट्र का यह विभाग अन्य विभागों से ज्यादा प्रभावी ,सक्रिय एवं महत्वपूर्ण है !

                                 
                                                                   शिवा नन्द द्विवेदी"सहर"
                                                                            9716248802

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

बुरा मान जाते है........................

मेरी दो पल कि खामोशी भी गवारा नहीं उन्हें ,

मगर दो लफ्ज़ भी बोला तो बुरा मान जाते हैं !

उनकी ख्वाहिश मै उनसे कभी नफ़रत ना करूँ ,

मगर जब प्यार भी करता तो बुरा मान जाते है !
 
इज़हारे मुहब्बत कि ख्वाहिश नहीं उन्हें , 
मगर इनकार भी करता तो बुरा मान जाते हैं!
 
मुझे ऐतवार करने कि दुहाइयां देते ,
 
कभी ऐतवार करता हूँ तो बुरा मान जाते हैं............

सोमवार, 10 जनवरी 2011

अबला अब तो संघर्ष करो ..............

अबला अब तो संघर्ष करो ,
कुछ आज तुम्हे करना होगा !
कुलसित
,कुत्सित मानव से अब,
खुद हेतु आज लड़ना होगा !

कब तक नारी तुम सोवोगी,

यह राष्ट्र ना सोने वालों का !
हे अचल धरा कि श्रृष्टि-दात्री,
फिर आज तुम्हे जगाना होगा !

यह देश सती सावित्री का ,

यह देश पदमा वीरांगना का है !
जो किया लक्ष्मीबाई ने ,
वो आज तुम्हे करना होगा !

मातृत्व तुम्हही में बसता है,

स्नेह तुम्ही बरसाती हो !
हे नारी खुद के हेतु तुम,
क्यों आज ना लड़ने आती हो !

संसार बड़ा पामर है ये

जो तुम्हे समझ ना पायेगा
नारी प्रताणना का ही ये
नित-नित इतिहास बनाएगा !

इतिहास बदलने कि खातिर

संकल्प आज लेना होगा
अपना अस्तित्व बचाने को
बलिदान पुन: देना होगा !

फिर धरा तुम्हारी ही होगी,

आकाश तुम्हारा ही होगा !
इस अखिल धरा पर हे देवी ,
सम्मान तुम्हारा भी होगा !

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

मोरे प्राण बसे हिम-खोह रे बटोहिया

दोस्तों  ..............वैसे तो मैंने अपने इस ब्लॉग "अनहद" को इस लिए बनाया कि इस पर मै स्वयं कि लिखी कृतियाँ ही  प्रकाशित करूंगा लेकिन आज फेसबुक पर मुझे एक ऐसी रचना मिली जिसके बोल मै बहुत दिनों से ढूंढ़ रहा था और इसे मै अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर अपने ब्लॉग कि शोभा बढ़ाना चाहूँगा  ! आज के सौ साल पहले 1911 में लिखित यह पंक्तियाँ यह  गीत जिसका शीर्षक शायद "बटोहिया" है आज भी लाखों दिलो पर राज करती है ! इस रचना ने भोजपुरी साहित्य को प्रारम्भ अवस्था में जो मुकाम दिलाया वो काल के कपाल पर अमिट है !  अपने शैशव अवस्था में ही भोजपुरी साहित्य को जो अनमोल रतन के रूप में ये हीरा मिला उसे अपने पास रख कर कौन गौरवान्वित नहीं होगा !...........................इसके रचयिता के नाम को ले कर मै थोड़ा भ्रमित हूँ अगर आपको पता हो तो अवश्य दें...

सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
मोरे प्राण बसे हिम-खोह रे बटोहिया
एक द्वार घेरे रामा हिम-कोतवालवा से
तीन द्वार सिंधु घहरावे रे बटोहिया
जाहु-जाहु भैया रे बटोही हिंद देखी आउ
जहवां कुहुंकी कोइली बोले रे बटोहिया
पवन सुगंध मंद अमर गगनवां से
कामिनी बिरह-राग गावे रे बटोहिया
बिपिन अगम घन सघन बगन बीच
चंपक कुसुम रंग देबे रे बटोहिया
द्रुम बट पीपल कदंब नींब आम वॄ‌छ
केतकी गुलाब फूल फूले रे बटोहिया
तोता तुती बोले रामा बोले भेंगरजवा से
पपिहा के पी-पी जिया साले रे बटोहिया
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
मोरे प्रान बसे गंगा धार रे बटोहिया
गंगा रे जमुनवा के झगमग पनिया से
सरजू झमकी लहरावे रे बटोहिया
ब्रह्मपुत्र पंचनद घहरत निसि दिन
सोनभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया
उपर अनेक नदी उमडी घुमडी नाचे
जुगन के जदुआ जगावे रे बटोहिया
आगरा प्रयाग काशी दिल्ली कलकतवा से
मोरे प्रान बसे सरजू तीर रे बटोहिया
जाउ-जाउ भैया रे बटोही हिंद देखी आउ
जहां ऋषि चारो बेद गावे रे बटोहिया
सीता के बीमल जस राम जस कॄष्ण जस
मोरे बाप-दादा के कहानी रे बटोहिया
ब्यास बालमीक ऋषि गौतम कपीलदेव
सूतल अमर के जगावे रे बटोहिया
रामानुज-रामानंद न्यारी-प्यारी रूपकला
ब्रह्म सुख बन के भंवर रे बटोहिया
नानक कबीर गौर संकर श्रीरामकॄष्ण
अलख के गतिया बतावे रे बटोहिया
बिद्यापति कालीदास सूर जयदेव कवि
तुलसी के सरल कहानी रे बटोहिया
जाउ-जाउ भैया रे बटोही हिंद देखि आउ
जहां सुख झूले धान खेत रे बटोहिया
बुद्धदेव पॄथु बिक्रमा्रजुन सिवाजी के
फिरि-फिरि हिय सुध आवे रे बटोहिया
अपर प्रदेस देस सुभग सुघर बेस
मोरे हिंद जग के निचोड रे बटोहिया
सुंदर सुभूमि भैया भारत के भूमि जेही
जन रघुबीर सिर नावे रे बटोहिया

बुधवार, 5 जनवरी 2011

कोई तो सिला दे साक़ी..........

इस रूह को उस रूह से तो मिला दे साक़ी,
पुरी नहीं तो थोड़ी तो पिला दे साक़ी ,
हम मर रहें हैं रोज़,नए नए तरीकों से ,
अपने तरीके से ही आज जिला दे साक़ी !!


पतझड़ के इस दौर में कोई फुल खिला दे साक़ी ,
मायूस फिजा में एक पत्ता तो हिला दे साक़ी,
साँसों के क़र्ज़ में कब तक जीते रहेंगे हम ,
गर उनसे ना मिला तो ख़ाक में मिला दे साक़ी !!


इन सिलसिलों के दौर में कोई तो सिला दे साक़ी,
जो जाम उनके नाम हो वही जाम पिला दे साक़ी,
वो नशा ढूंढ़ ला जो ताउम्र कभी ना उतरे,
अगर जरुरी हो थोड़ी ज़हर मिला दे साक़ी !!