गुरुवार, 6 जनवरी 2011

मोरे प्राण बसे हिम-खोह रे बटोहिया

दोस्तों  ..............वैसे तो मैंने अपने इस ब्लॉग "अनहद" को इस लिए बनाया कि इस पर मै स्वयं कि लिखी कृतियाँ ही  प्रकाशित करूंगा लेकिन आज फेसबुक पर मुझे एक ऐसी रचना मिली जिसके बोल मै बहुत दिनों से ढूंढ़ रहा था और इसे मै अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर अपने ब्लॉग कि शोभा बढ़ाना चाहूँगा  ! आज के सौ साल पहले 1911 में लिखित यह पंक्तियाँ यह  गीत जिसका शीर्षक शायद "बटोहिया" है आज भी लाखों दिलो पर राज करती है ! इस रचना ने भोजपुरी साहित्य को प्रारम्भ अवस्था में जो मुकाम दिलाया वो काल के कपाल पर अमिट है !  अपने शैशव अवस्था में ही भोजपुरी साहित्य को जो अनमोल रतन के रूप में ये हीरा मिला उसे अपने पास रख कर कौन गौरवान्वित नहीं होगा !...........................इसके रचयिता के नाम को ले कर मै थोड़ा भ्रमित हूँ अगर आपको पता हो तो अवश्य दें...

सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
मोरे प्राण बसे हिम-खोह रे बटोहिया
एक द्वार घेरे रामा हिम-कोतवालवा से
तीन द्वार सिंधु घहरावे रे बटोहिया
जाहु-जाहु भैया रे बटोही हिंद देखी आउ
जहवां कुहुंकी कोइली बोले रे बटोहिया
पवन सुगंध मंद अमर गगनवां से
कामिनी बिरह-राग गावे रे बटोहिया
बिपिन अगम घन सघन बगन बीच
चंपक कुसुम रंग देबे रे बटोहिया
द्रुम बट पीपल कदंब नींब आम वॄ‌छ
केतकी गुलाब फूल फूले रे बटोहिया
तोता तुती बोले रामा बोले भेंगरजवा से
पपिहा के पी-पी जिया साले रे बटोहिया
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
मोरे प्रान बसे गंगा धार रे बटोहिया
गंगा रे जमुनवा के झगमग पनिया से
सरजू झमकी लहरावे रे बटोहिया
ब्रह्मपुत्र पंचनद घहरत निसि दिन
सोनभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया
उपर अनेक नदी उमडी घुमडी नाचे
जुगन के जदुआ जगावे रे बटोहिया
आगरा प्रयाग काशी दिल्ली कलकतवा से
मोरे प्रान बसे सरजू तीर रे बटोहिया
जाउ-जाउ भैया रे बटोही हिंद देखी आउ
जहां ऋषि चारो बेद गावे रे बटोहिया
सीता के बीमल जस राम जस कॄष्ण जस
मोरे बाप-दादा के कहानी रे बटोहिया
ब्यास बालमीक ऋषि गौतम कपीलदेव
सूतल अमर के जगावे रे बटोहिया
रामानुज-रामानंद न्यारी-प्यारी रूपकला
ब्रह्म सुख बन के भंवर रे बटोहिया
नानक कबीर गौर संकर श्रीरामकॄष्ण
अलख के गतिया बतावे रे बटोहिया
बिद्यापति कालीदास सूर जयदेव कवि
तुलसी के सरल कहानी रे बटोहिया
जाउ-जाउ भैया रे बटोही हिंद देखि आउ
जहां सुख झूले धान खेत रे बटोहिया
बुद्धदेव पॄथु बिक्रमा्रजुन सिवाजी के
फिरि-फिरि हिय सुध आवे रे बटोहिया
अपर प्रदेस देस सुभग सुघर बेस
मोरे हिंद जग के निचोड रे बटोहिया
सुंदर सुभूमि भैया भारत के भूमि जेही
जन रघुबीर सिर नावे रे बटोहिया

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें