बुधवार, 29 दिसंबर 2010

कहाँ तू कहाँ .........?

निगाहें थमी की थमी रह गयीं
जब निगाहों में जल का समंदर बना
जिस दिल को  तसल्ली दिलाते थे 
वो
वो दिल ही जिसम का सितमगर बना 

अश्रुओं की श्रद्धा बस है अर्पित तुम्हे
अब तेरा हर सफ़र बस मुक्कद्दर बना
जिस मुक्कद्दर ने मुझसे था धोखा किया
उस मुक्कद्दर का ही मै सिकंदर बना

निगाहें जखम देखती ही रहीं

हर जगह जख्म के दाग देखे जहां
पर निगाहें अभी खोजती हैं उन्हें
पूछती हर मुसाफिर से हैं वो कहाँ

ह्रदय में ये यादों का जज्बा उठा

कुछ ह्रदय के तरंगों का नजमा उठा
जिन्दगी का वो बढ़ता कदम रुक गया
रोते-रोते हमारा गला सुख गया

जीवन का हर पल अब तन्हा हुआ

हर बरस की तरह हर एक लम्हा हुआ
जो उन्हें ले गया वो कहर है कहाँ
मौत के मंजिलों का ज़हर है कहाँ

मै श्रद्धा सुमन आज अर्पण करूँ

तुच्छ
  हाथों से तुझको क्या तर्पण करूँ
अश्रुं बूँदें मेरी अब गिरेंगी जहां
हर जगह पूछेंगी कह कहाँ तू कहाँ .............कह कहाँ तू कहाँ ...........कह 


किसी अज़ीज़ की पुण्यतिथि पर रचित पंक्तिया जो आज तक कभी भी कहीं भी साझा नहीं की और उसकी हर पुण्यतिथि पर दोहराता हूँ आज प्रथम बार सबके सामने रख रहा हूँ........

6 टिप्‍पणियां:

  1. शिवानन्द भाई

    बहुत ही बेहतरीन रचना , और आपके इस रचना से आपका नेह छलक रहा है उस अजीज के लिये ।

    बहुत ही भावपुर्ण , मार्मिक , और उम्दा रचना !

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  2. आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद

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  3. शिवानन्द भाई

    बहुत ही बेहतरीन रचना , और आपके इस रचना से आपका नेह छलक रहा है उस अजीज के लिये ।

    बहुत ही भावपुर्ण , मार्मिक रचना !
    मगर एक बात कि आप ने अपने अज़ीज़ का नाम नहीं दिया , अगर देते तो और अच्छा होता कि आप के मित्र थे या निजी

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  4. सबसे पहले तो बहुत बहुत धन्यवाद सराहना के लिए............नाम न बता पाने के लिए माफ़ी ............कतिपय कारणों से नाम उजागर नहीं कर सकता

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