बुधवार, 5 जनवरी 2011

कोई तो सिला दे साक़ी..........

इस रूह को उस रूह से तो मिला दे साक़ी,
पुरी नहीं तो थोड़ी तो पिला दे साक़ी ,
हम मर रहें हैं रोज़,नए नए तरीकों से ,
अपने तरीके से ही आज जिला दे साक़ी !!


पतझड़ के इस दौर में कोई फुल खिला दे साक़ी ,
मायूस फिजा में एक पत्ता तो हिला दे साक़ी,
साँसों के क़र्ज़ में कब तक जीते रहेंगे हम ,
गर उनसे ना मिला तो ख़ाक में मिला दे साक़ी !!


इन सिलसिलों के दौर में कोई तो सिला दे साक़ी,
जो जाम उनके नाम हो वही जाम पिला दे साक़ी,
वो नशा ढूंढ़ ला जो ताउम्र कभी ना उतरे,
अगर जरुरी हो थोड़ी ज़हर मिला दे साक़ी !!




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