ज़िंदगी एक झूठ है ,
ज़िंदगी मानव मात्र हेतु
एक छलावा है एक फरेब है !
एक ही धुरी के सभी लोग
उनमे कुछ अपने हैं
तो कुछ पराये भी
कुछ दिल के अजीज हैं
कुछ दुश्मन भी !
यहाँ कोई तुम्हारा है
तो तुम किसी के लिए ,
कभी-कभी सोचता हूँ
ज़िंदगी का वृत्त इतना सीमित क्यों ?
क्यों हम सर्वत्र के लिए नहीं
या क्यों सर्वत्र हमारे लिए नहीं ?
ज़िंदगी एक ऐसा इम्तहान है
जिसका वक्त रहते कोई परिणाम नहीं आता ,
परिणाम की लालसा में जिज्ञासु मानव
संघर्ष,इर्ष्या,प्रेम के सभी पथों को लांघ जाता है !
कुछ पाने पर हसता है ,
कुछ खोने पर वही रोता है !
ज़िन्दगी के इस इम्तहान में
श्री कृष्ण की गीता सर्वदा उपेक्षित है !
जीवन इसी तरह सतत गतिशील है,
इस भौतिक जीवन का
जब सार्थक परिणाम आता है तो,
जीवन अपने लक्ष्यादर्शन में
सक्षम नहीं होता !
क्योंकि..
जीवन का अहम् परिणाम तो
मौत है
अंत है
निरंतरावकाश है !
बहुत positive कविता...
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